श्रीलंका में रविवार को चर्चों और होटलों में हुए आठ बम धमाकों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 310 हो गई है.
मारे गए लोगों के सामूहिक अंतिम संस्कार का पहला चरण मंगलवार को शुरू हो गया. पूरे देश में तीन मिनट का मौन रखा गया और आगे किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए इमरजेंसी लगा दी गई है.
पुलिस के मीडिया विभाग ने बताया है कि 500 लोग घायल हैं.
अधिकारियों का कहना है कि ये बम धमाके किसी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की मदद से कराए गए.
सरकार ने इसके लिए एक स्थानीय जेहादी गुट - नेशनल तौहीद जमात - का नाम लिया है, हालाँकि अब तक किसी ने भी इस हमले की ज़िम्मेदारी नहीं ली है.
मामले में अब तक 38 लोग हिरासत में लिए जा चुके हैं. इनमें से 26 लोगों को सीआईडी ने, तीन को आतंकरोधी दस्ते ने और नौ को पुलिस ने गिरफ्तार किया है.
गिरफ़्तार किए गए लोगों में से सिर्फ नौ को अदालत में पेश किया गया है. ये नौ लोग वेल्लमपट्टी की एक ही फ़ैक्ट्री में काम करते हैं.
इससे पहले पुलिस के अनुसार एक चर्च के बाहर एक वैन में विस्फोटकों को निष्क्रिय करते वक़्त उसमें धमाका हो गया. उन्होंने बताया कि ये वैन हमलावरों की थी जिन्होंने एक दिन पहले इस चर्च को निशाना बनाया था. धमाके की आवाज़ के बाद वहाँ मौजूद लोग दहशत में आकर भागने लगे.
इस बीच हमले की पहले से ही चेतावनी मिलने के बाद सरकार की ओर से कोई क़दम न उठाने के आरोपों पर श्रीलंका में हंगामा मचा हुआ है.
राष्ट्रपति सिरीसेना के सलाहकार शिराल लकथिलाका ने बीबीसी से कहा है कि इस बात की जांच होगी कि सरकार की ओर से कोई चूक हुई है या नहीं,
इससे पहले श्रीलंका के एक वरिष्ठ मंत्री रजित सेनारत्ने ने कोलंबो में पत्रकारों से कहा कि अंतरराष्ट्रीय ख़ुफ़िया एजेंसियों ने ऐसे किसी हमले की चेतावनी दी थी मगर ये सूचना प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे तक नहीं पहुँच सकी.
पुलिस के अनुसार अब तक 38 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है मगर अभी ये पता नहीं है कि हमलों के पीछे कौन है.
मृतकों में 38 विदेशी नागरिक हैं. आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक इनमें दस भारतीय शामिल हैं.
भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने रविवार को भारत की लक्ष्मी, नारायण चंद्रशेखर और रमेश की मौत की पुष्टि की थी. जबकि केरल के मुख्यमंत्री ने एक अन्य भारतीय नागरिक पीएस रासीना का नाम मृतकों में जोड़ा था.
मामले में गिरफ़्तार किए गए सभी लोग श्रीलंका के ही नागरिक हैं. इन लोगों के किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन से संपर्कों की भी जांच की जा रही है. अभी तक किसी भी संगठन ने इन धमाकों की ज़िम्मेदारी नहीं ली है.
प्रधानमंत्री का कहना है कि ऐसा प्रतीत होता है कि संभावित हमलों के बारे में पुलिस के पास पहले से जानकारी थी लेकिन कैबिनेट को इस बारे में जानकारी नहीं दी गई थी.
हमलों के बाद रविवार को समूचे श्रीलंका में कर्फ्यू लगा दिया गया था, जिसे सोमवार सुबह हटा लिया गया. सोशल मीडिया को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है. सोमवार रात आठ बजे से अगले दिन सुबह चार बजे तक फिर से कर्फ्यू लगाया जाएगा.
श्रीलंका के रक्षामंत्री आर विजयवर्धन का कहना है, ''ये आत्मघाती हमले हैं. ख़ुफ़िया एजेंसियों ने हमले के बारे में सूचित किया था, लेकिन इससे पहले कि उन्हें रोका जाता, धमाके हो गए. हमले की साज़िश विदेश में रची गई.''
नेगोम्बो में एक आदमी ने एएफ़पी को बताया कि सेंट सेबस्टियन चर्च में वो और उनकी पत्नी प्रार्थना में शामिल होने गए थे.
दिलीप फर्नांडो ने कहा, "लेकिन वहां बहुत भीड़ थी. मैं वहां खड़े नहीं रहना चाहता था, इसलिए मैं दूसरे चर्च में चला गया."
लेकिन दिलीप के परिवार के कुछ सदस्य चर्च के अंदर थे, विस्फ़ोट में वो बच गए लेकिन उनका मानना है कि उन्होंने आत्मघाती हमलावर को देखा था.
दिलीप के अनुसार, "प्रार्थना के बाद उन्होंने देखा कि एक युवा भारी बैग के साथ चर्च के अंदर गया. उसने मेरे दादा का सिर भी छुआ. यही हमलावर था."
हमले किसने किए हैं, इसे लेकर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है. पकड़े गए लोगों को लेकर भी कुछ सार्वजनिक नहीं किया गया है.
श्रीलंका के दूरसंचार मंत्री हरिन फर्नांडो ने भी बीबीसी से बातचीत में कहा कि सरकार के पास आज हुए हमलों के बारे में ख़ुफ़िया रिपोर्ट थी.
उन्होंने कहा, "इस ख़ुफ़िया रिपोर्ट के बारे में प्रधानमंत्री को जानकारी नहीं दी गई थी. इस रिपोर्ट को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया, ये सवाल भी कैबिनेट में उठा है."
उन्होंने बताया, "ख़ुफ़िया रिपोर्ट में कहा गया है कि चार तरह से हमले हो सकते हैं. आत्मघाती बम धमाके हो सकते हैं, हथियारों से हमला हो सकता है, चाकू हमला हो सकता है या विस्फ़ोटकों से लदे ट्रक से हमला हो सकता है. इस रिपोर्ट में कुछ संदिग्धों के नाम का भी ज़िक्र है. उनके टेलिफ़ोन नंबर भी रिपोर्ट में दिए गए थे. ये आश्चर्यजनक है कि ख़ुफ़िया विभाग के पास ये रिपोर्ट थी लेकिन इस बारे में कैबिनेट या प्रधानमंत्री को नहीं पता था."
फ़र्नांडो ने कहा, "ये रिपोर्ट एक दस्तावेज़ है और ये दस्तावेज़ अब हमारे पास है. इस रिपोर्ट में कुछ नामों का भी ज़िक्र है. इसमें कुछ संगठनों के भी नाम हैं. जो मैं सुन रहा हूं उससे पता चल रहा है कि जांच सही चल रही है और हम उन लोगों तक पहुंच जाएंगे जिन्होंने ये हमले किए हैं. हमले के पीछे कौन लोग हैं और कौन समूह हैं उनकी पहचान कर ली गई है. कल शाम तक हमारे पास पूरी जानकारियां होंगी."
Tuesday, April 23, 2019
Wednesday, April 17, 2019
चेन्नई-हैदराबाद का मैच आज, सनराइजर्स को हराकर सुपरकिंग्स की प्लेऑफ में पहुंचने पर नजर
खेल डेस्क. इंडियन प्रीमियर लीग के 12वें सीजन का 33वां मुकाबला बुधवार को राजीव गांधी स्टेडियम पर रात 8 बजे से चेन्नई सुपरकिंग्स और सनराइजर्स हैदराबाद के बीच खेला जाएगा। चेन्नई इस सीजन में 8 में से 7 मैच जीतकर अंक तालिका में शीर्ष पर है। उसके 14 अंक हैं। यदि वह हैदराबाद को हरा देती है तो उसके 16 अंक हो जाएंगे और प्लेऑफ में उसका पहुंचना तय हो जाएगा।
जीती तो टॉप-4 में पहुंचेगी हैदराबाद
सनराइजर्स इस सीजन में सुपरकिंग्स के खिलाफ पहली बार मैदान पर उतर रहे हैं। वे अपने पिछले लगातार 3 मैच हार चुके हैं। उनके 7 मैच में 6 अंक हैं। वे इस समय छठे नंबर पर हैं। यदि घरेलू मैदान पर वे चेन्नई को हरा देते हैं तो उनके 8 अंक हो जाएंगे और वे तालिका में टॉप-4 में पहुंच जाएंगे।
हैदराबाद घरेलू मैदान पर पिछले 2 मैच हार चुकी
आईपीएल में दोनों के बीच अब तक 11 मैच खेले गए हैं। इनमें से चेन्नई 9 और हैदराबाद 2 मैच जीतने में सफल रही है। राजीव गांधी स्टेडियम पर दोनों के बीच अब तक 3 मैच हुए हैं। इनमें से चेन्नई ने 2 जबकि हैदराबाद ने एक मुकाबला जीता। हैदराबाद ने इस सीजन में इस मैदान पर अब तक 4 मैच खेले हैं। इनमें से वह 2 ही जीत पाई है, जबकि उसे पिछले 2 मुकाबलों में हार झेलनी पड़ी है।
हैदराबाद की ओपनर्स पर निर्भरता ज्यादा
हैदराबाद जीत के लिए अपने ओपनिंग बल्लेबाजों डेविड वॉर्नर और जॉनी बेयर्स्टो पर सबसे ज्यादा निर्भर है। उसके अन्य बल्लेबाज अब तक कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर पाए हैं। ऑलराउंडर विजय शंकर भी पिछले मैच में एक रन ही बना पाए थे। शंकर ने अब तक 7 मैच में 132 रन बनाए हैं। इसमें उनकी सबसे बड़ी पारी 40 रन की थी।
हैदराबाद का गेंदबाजी विभाग कुछ बेहतर है। संदीप शर्मा 7 मैच में 8 विकेट लेकर सबसे सफल हैं। हालांकि, राशिद खान पिछले सीजन जैसा प्रदर्शन नहीं दिखा पाए हैं। उनके 7 मैच में 6 ही विकेट हैं। सिद्धार्थ कौल को 6 विकेट मिले हैं। भुवनेश्वर कुमार ने 7 मैच में 5 विकेट ही लिए हैं। उन्होंने 8.74 के इकॉनमी रेट से रन दिए हैं।
चेन्नई का ऑलराउंड प्रदर्शन
दूसरी ओर, चेन्नई हर विभाग में संतुलित टीम है। उसने पिछले मैच में कोलकाता नाइटराइडर्स को 5 विकेट से हराया था। टीम के बल्लेबाजी विभाग में शेन वॉटसन, सुरेश रैना, फाफ डुप्लेसिस और कप्तान धोनी जैसे खिलाड़ी हैं। गेंदबाजों में दीपक चाहर, इमरान ताहिर और हरभजन सिंह अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभा रहे हैं।
पिछले मैच में रैना ने 58 रन की पारी खेली थी। स्पिनर ताहिर 27 रन पर 4 विकेट लेकर मैन ऑफ द मैच रहे थे। धोनी भी इस समय बेहतरीन फॉर्म मे हैं। वे 8 मैच में 76.66 के औसत से 230 रन बनाकर अपनी टीम के शीर्ष स्कोरर हैं। गेंदबाजों में ताहिर 13 विकेट और चाहर (10 विकेट) के साथ सबसे सफल हैं।
दोनों टीमें इस प्रकार हैं
चेन्नई सुपरकिंग्स : महेंद्र सिंह धोनी (कप्तान), केएम आसिफ, सैम बिलिंग्स, चैतन्य बिश्नोई, ड्वेन ब्रावो, दीपक चाहर, फाफ डुप्लेसिस, ऋतुराज गायकवाड़, हरभजन सिंह, इमरान ताहिर, रविंद्र जडेजा, केदार जाधव, नारायण जगदीशन, स्कॉट कुगलिन, मोनू कुमार, सुरेश रैना, अंबाती रायडू, मिशेल सैंटनर, कर्ण शर्मा, ध्रुव शोरे, मोहित शर्मा, शार्दुल ठाकुर, मुरली विजय, शेन वॉटसन, डेविड विली।
सनराइजर्स हैदराबाद : भुवनेश्वर कुमार (कप्तान), डेविड वॉर्नर, अभिषेक शर्मा, जॉनी बेयर्स्टो, खलील अहमद, रिकी भुई, बासिल थम्पी, श्रीवत्स गोस्वामी, मार्टिन गुप्टिल, दीपक हुड्डा, सिद्धार्थ कौल, मोहम्मद नबी, शहबाज नदीम, टी. नटराजन, मनीष पांडे, यूसुफ पठान, राशिद खान, ऋद्धिमान साहा, संदीप शर्मा, विजय शंकर, शाकिब अल हसन और बिली स्टेनलेक।
जीती तो टॉप-4 में पहुंचेगी हैदराबाद
सनराइजर्स इस सीजन में सुपरकिंग्स के खिलाफ पहली बार मैदान पर उतर रहे हैं। वे अपने पिछले लगातार 3 मैच हार चुके हैं। उनके 7 मैच में 6 अंक हैं। वे इस समय छठे नंबर पर हैं। यदि घरेलू मैदान पर वे चेन्नई को हरा देते हैं तो उनके 8 अंक हो जाएंगे और वे तालिका में टॉप-4 में पहुंच जाएंगे।
हैदराबाद घरेलू मैदान पर पिछले 2 मैच हार चुकी
आईपीएल में दोनों के बीच अब तक 11 मैच खेले गए हैं। इनमें से चेन्नई 9 और हैदराबाद 2 मैच जीतने में सफल रही है। राजीव गांधी स्टेडियम पर दोनों के बीच अब तक 3 मैच हुए हैं। इनमें से चेन्नई ने 2 जबकि हैदराबाद ने एक मुकाबला जीता। हैदराबाद ने इस सीजन में इस मैदान पर अब तक 4 मैच खेले हैं। इनमें से वह 2 ही जीत पाई है, जबकि उसे पिछले 2 मुकाबलों में हार झेलनी पड़ी है।
हैदराबाद की ओपनर्स पर निर्भरता ज्यादा
हैदराबाद जीत के लिए अपने ओपनिंग बल्लेबाजों डेविड वॉर्नर और जॉनी बेयर्स्टो पर सबसे ज्यादा निर्भर है। उसके अन्य बल्लेबाज अब तक कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर पाए हैं। ऑलराउंडर विजय शंकर भी पिछले मैच में एक रन ही बना पाए थे। शंकर ने अब तक 7 मैच में 132 रन बनाए हैं। इसमें उनकी सबसे बड़ी पारी 40 रन की थी।
हैदराबाद का गेंदबाजी विभाग कुछ बेहतर है। संदीप शर्मा 7 मैच में 8 विकेट लेकर सबसे सफल हैं। हालांकि, राशिद खान पिछले सीजन जैसा प्रदर्शन नहीं दिखा पाए हैं। उनके 7 मैच में 6 ही विकेट हैं। सिद्धार्थ कौल को 6 विकेट मिले हैं। भुवनेश्वर कुमार ने 7 मैच में 5 विकेट ही लिए हैं। उन्होंने 8.74 के इकॉनमी रेट से रन दिए हैं।
चेन्नई का ऑलराउंड प्रदर्शन
दूसरी ओर, चेन्नई हर विभाग में संतुलित टीम है। उसने पिछले मैच में कोलकाता नाइटराइडर्स को 5 विकेट से हराया था। टीम के बल्लेबाजी विभाग में शेन वॉटसन, सुरेश रैना, फाफ डुप्लेसिस और कप्तान धोनी जैसे खिलाड़ी हैं। गेंदबाजों में दीपक चाहर, इमरान ताहिर और हरभजन सिंह अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभा रहे हैं।
पिछले मैच में रैना ने 58 रन की पारी खेली थी। स्पिनर ताहिर 27 रन पर 4 विकेट लेकर मैन ऑफ द मैच रहे थे। धोनी भी इस समय बेहतरीन फॉर्म मे हैं। वे 8 मैच में 76.66 के औसत से 230 रन बनाकर अपनी टीम के शीर्ष स्कोरर हैं। गेंदबाजों में ताहिर 13 विकेट और चाहर (10 विकेट) के साथ सबसे सफल हैं।
दोनों टीमें इस प्रकार हैं
चेन्नई सुपरकिंग्स : महेंद्र सिंह धोनी (कप्तान), केएम आसिफ, सैम बिलिंग्स, चैतन्य बिश्नोई, ड्वेन ब्रावो, दीपक चाहर, फाफ डुप्लेसिस, ऋतुराज गायकवाड़, हरभजन सिंह, इमरान ताहिर, रविंद्र जडेजा, केदार जाधव, नारायण जगदीशन, स्कॉट कुगलिन, मोनू कुमार, सुरेश रैना, अंबाती रायडू, मिशेल सैंटनर, कर्ण शर्मा, ध्रुव शोरे, मोहित शर्मा, शार्दुल ठाकुर, मुरली विजय, शेन वॉटसन, डेविड विली।
सनराइजर्स हैदराबाद : भुवनेश्वर कुमार (कप्तान), डेविड वॉर्नर, अभिषेक शर्मा, जॉनी बेयर्स्टो, खलील अहमद, रिकी भुई, बासिल थम्पी, श्रीवत्स गोस्वामी, मार्टिन गुप्टिल, दीपक हुड्डा, सिद्धार्थ कौल, मोहम्मद नबी, शहबाज नदीम, टी. नटराजन, मनीष पांडे, यूसुफ पठान, राशिद खान, ऋद्धिमान साहा, संदीप शर्मा, विजय शंकर, शाकिब अल हसन और बिली स्टेनलेक।
Wednesday, April 10, 2019
राम मंदिर मुद्दा ही नहीं, आंदोलन से जुड़े चेहरे भी परिदृश्य से बाहर
लोकसभा चुनाव हों या फिर उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव, पिछले तीन-चार दशक से राम मंदिर का मुद्दा किसी न किसी रूप में ज़रूर छाया रहता था, लेकिन इस बार के चुनाव में न सिर्फ़ यह मुद्दा कहीं नहीं दिख रहा है बल्कि राम मंदिर आंदोलन से जुड़े तमाम चेहरे भी राजनीतिक परिदृश्य से ग़ायब हैं.
हालांकि लोकसभा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा सुर्खि़यों में ज़रूर था.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों के इंतज़ार और फिर कोर्ट की सुलह कराने की कोशिशों की वजह से तो ये मुद्दा चर्चा में था ही, विश्व हिन्दू परिषद ने भी दो-दो धर्म संसद की बैठकें करके इस मुद्दे को हवा देने की पूरी कोशिश की लेकिन चुनाव की घोषणा आते-आते यह मुद्दा चर्चा से ग़ायब हो गया.
न सिर्फ़ राजनीतिक दलों की ओर से बल्कि सोशल मीडिया में भी इस पर कोई चर्चा होती नहीं दिख रही है.
वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, "राम मंदिर की चर्चा मुख्य रूप से बीजेपी ही करती है. अब तक उसके पास यह बहाना था कि इस मामले के कोर्ट में होने के अलावा केंद्र और राज्य में अलग-अलग सरकारों की वजह से वह इस पर कुछ ख़ास नहीं कर पा रही है. लेकिन इस बार ऐसा कोई बहाना सामने नहीं है. ज़ाहिर है, इस मुद्दे को उठाकर वह ख़ुद को ही घिरी पाती."
वो कहते हैं, "ऐसे में पुलवामा की घटना और उसके बाद बालाकोट में हुई सैन्य कार्रवाई के ज़रिए राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय अस्मिता का मामला उसे ज़्यादा लाभकारी मुद्दा लगा और वो उस मुद्दे को जमकर उठा भी रही है."
दरअसल, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पुलवामा की घटना ने बीजेपी के लिए चुनावी मुद्दे को पूरी तरह से बदल दिया. बालाकोट में वायु सेना के अभियान के बाद देश भर में राष्ट्रवादी माहौल बनाने और फिर उसकी आड़ में विपक्ष को घेरने की रणनीति बीजेपी को कहीं ज़्यादा कारगर दिखने लगी. जानकारों के मुताबिक़, राम मंदिर जैसे 'रिस्की' मुद्दे की बजाय, यह मुद्दा कहीं ज़्यादा फ़ायदेमंद दिख रहा है.
लेकिन यहां सबसे दिलचस्प तथ्य ये है कि 1990 के बाद यह शायद पहला लोकसभा चुनाव हो जब राम मंदिर आंदोलन से जुड़े तमाम नेता और साधु-संत चुनावी परिदृश्य से बाहर दिख रहे हों.
हालांकि इनमें से कई लोग अब जीवित नहीं है, कुछ को उम्र के चलते बीजेपी ने 'रिटायर' कर दिया है लेकिन कुछ शारीरिक रूप से सक्रिय होने के बावजूद राजनीतिक रूप से या तो निष्क्रिय बना दिए गए हैं या फिर निष्क्रिय हो गए हैं.
अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के चलते 'उग्र हिन्दुत्व' का नारा बुलंद करने वाले तेज़-तर्रार नेताओं का नब्बे के दशक में राजनीति में न सिर्फ़ बड़ी संख्या में प्रवेश हुआ बल्कि राजनीति में इनकी ज़बर्दस्त दख़ल भी रही. उस दौर के तमाम युवा नेताओं के अलावा कई साधु-संतों के लिए भी विश्व हिन्दू परिषद और कुछ अन्य संगठनों के रास्ते भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश हुआ और लोग सांसद-विधायक और मंत्री तक बने.
भारतीय जनता पार्टी में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की तिकड़ी के अलावा कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार, स्वामी चिन्मयानंद, रामविलास वेदांती जैसे तमाम लोग इस सूची में शामिल हैं.
इनमें से ज़्यादातर नेता साल 2014 के बाद से ही राजनीतिक वनवास की ओर भेजे जाने लगे और अब लगभग पूरी तरह से भेजे जा चुके हैं.
राम मंदिर आंदोलन को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह इसकी वजह बताते हैं, "भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व अब जिन हाथों में है, उनका राम मंदिर आंदोलन से कोई वास्ता नहीं रहा. लेकिन ये सबको पता है कि मंदिर आंदोलन से जुड़े नेताओं का एक अलग आभामंडल हुआ करता था और एक ख़ास वर्ग में उनकी ज़बरदस्त अपील थी. मंदिर आंदोलन से जुड़े नेताओं ने मौजूदा नेतृत्व को स्वीकार भी नहीं किया. दूसरी ओर, मौजूदा नेतृत्व चाहता भी नहीं कि इनका आभा मंडल बरक़रार रहे. दरअसल, मौजूदा नेतृत्व बीजेपी की पहचान बन चुके मंदिर मुद्दे को भी बीजेपी से अलग रखने की ही कोशिश में लगा हुआ है."
अरविंद कुमार सिंह कहते हैं कि साल 2014 के बाद मंदिर आंदोलन से जुड़े नेता धीरे-धीरे राजनीतिक हाशिए पर लाए गए और अब पूरी तरह से उन्हें बीजेपी की राजनीति से दूर कर दिया गया है और पार्टी में उन्हीं नेताओं का बोलबाला है जो मंदिर आंदोलन के समय थे ज़रूर, लेकिन उस आंदोलन का वो कभी हिस्सा नहीं रहे.
उनके मुताबिक़, "नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति में थे ज़रूर लेकिन मंदिर आंदोलन के दौरान या उसके बाद भी ऐसा कोई बड़ा प्रभार या ज़िम्मेदारी उनके पास नहीं थी. उत्तर प्रदेश मंदिर आंदोलन और उसके चलते देश भर में बीजेपी के जनाधार की धुरी था. लेकिन यूपी से बड़े नेताओं को चुन-चुनकर मुख्य धारा की राजनीति से दूर कर दिया गया. वाजपेयी जी के समय ऐसा नहीं था. उस समय मंदिर आंदोलन से जुड़े नेताओं को न सिर्फ़ पार्टी में सम्मान मिला बल्कि तमाम साधु-संतों को भी राजनीति में आने का मौक़ा मिला."
विनय कटियार, कल्याण सिंह, उमा भारती, कलराज मिश्र, रामविलास वेदांती, स्वामी चिन्मयानंद जैसे बीजेपी के तमाम नेता राम मंदिर आंदोलन का भी जाना-पहचाना चेहरा हुआ करते थे. अटल बिहारी वाजपेयी का निधन हो चुका है, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और कलराज मिश्र को उम्रदराज़ होने के चलते टिकट नहीं दिया, उमा भारती ने चुनाव लड़ने से ख़ुद ही मना कर दिया जबकि कुछ लोग टिकट की आस लगाए होने के बावजूद टिकट पा नहीं सके.
राम विलास वेदांती तो पिछले हफ़्ते सरकार और बीजेपी के मौजूदा नेतृत्व पर ख़ासे नाराज़ हुए और उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगा दिया कि बीजेपी कभी राम मंदिर बनवाना चाहती ही नहीं थी.
उन्होंने कहा, "विश्व हिन्दू परिषद और आरएसएस के लोगों के बलिदान के चलते बीजेपी सत्ता में आई. लेकिन बीजेपी ने रामजन्मभूमि को स्वीकार नहीं किया, यह आश्चर्य की बात है. पांच साल हो गए, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार भी अयोध्या नहीं आए. मुझे आश्चर्य है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी भगवान राम और अयोध्या में राम मंदिर को कैसे भूल गई है."
हालांकि बीजेपी के नेता राम मंदिर के मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में होने की बात कहकर टाल देते हैं लेकिन मंदिर आंदोलन से जुड़े नेताओं के राजनीतिक वनवास पर जवाब देने में उन्हें भी दिक़्क़त होती है.
बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं, "टिकट किसे देना है, किसे नहीं देना है ये चुनाव समिति तय करती है. इस बारे में कोई एक व्यक्ति तो फ़ैसला करता नहीं है. पार्टी जिसे अधिकृत करती है, वही लोग कमेटी में होते हैं और उन्हीं की स्वीकृति से टिकट मिलता है."
हालांकि लोकसभा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा सुर्खि़यों में ज़रूर था.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों के इंतज़ार और फिर कोर्ट की सुलह कराने की कोशिशों की वजह से तो ये मुद्दा चर्चा में था ही, विश्व हिन्दू परिषद ने भी दो-दो धर्म संसद की बैठकें करके इस मुद्दे को हवा देने की पूरी कोशिश की लेकिन चुनाव की घोषणा आते-आते यह मुद्दा चर्चा से ग़ायब हो गया.
न सिर्फ़ राजनीतिक दलों की ओर से बल्कि सोशल मीडिया में भी इस पर कोई चर्चा होती नहीं दिख रही है.
वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, "राम मंदिर की चर्चा मुख्य रूप से बीजेपी ही करती है. अब तक उसके पास यह बहाना था कि इस मामले के कोर्ट में होने के अलावा केंद्र और राज्य में अलग-अलग सरकारों की वजह से वह इस पर कुछ ख़ास नहीं कर पा रही है. लेकिन इस बार ऐसा कोई बहाना सामने नहीं है. ज़ाहिर है, इस मुद्दे को उठाकर वह ख़ुद को ही घिरी पाती."
वो कहते हैं, "ऐसे में पुलवामा की घटना और उसके बाद बालाकोट में हुई सैन्य कार्रवाई के ज़रिए राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय अस्मिता का मामला उसे ज़्यादा लाभकारी मुद्दा लगा और वो उस मुद्दे को जमकर उठा भी रही है."
दरअसल, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पुलवामा की घटना ने बीजेपी के लिए चुनावी मुद्दे को पूरी तरह से बदल दिया. बालाकोट में वायु सेना के अभियान के बाद देश भर में राष्ट्रवादी माहौल बनाने और फिर उसकी आड़ में विपक्ष को घेरने की रणनीति बीजेपी को कहीं ज़्यादा कारगर दिखने लगी. जानकारों के मुताबिक़, राम मंदिर जैसे 'रिस्की' मुद्दे की बजाय, यह मुद्दा कहीं ज़्यादा फ़ायदेमंद दिख रहा है.
लेकिन यहां सबसे दिलचस्प तथ्य ये है कि 1990 के बाद यह शायद पहला लोकसभा चुनाव हो जब राम मंदिर आंदोलन से जुड़े तमाम नेता और साधु-संत चुनावी परिदृश्य से बाहर दिख रहे हों.
हालांकि इनमें से कई लोग अब जीवित नहीं है, कुछ को उम्र के चलते बीजेपी ने 'रिटायर' कर दिया है लेकिन कुछ शारीरिक रूप से सक्रिय होने के बावजूद राजनीतिक रूप से या तो निष्क्रिय बना दिए गए हैं या फिर निष्क्रिय हो गए हैं.
अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के चलते 'उग्र हिन्दुत्व' का नारा बुलंद करने वाले तेज़-तर्रार नेताओं का नब्बे के दशक में राजनीति में न सिर्फ़ बड़ी संख्या में प्रवेश हुआ बल्कि राजनीति में इनकी ज़बर्दस्त दख़ल भी रही. उस दौर के तमाम युवा नेताओं के अलावा कई साधु-संतों के लिए भी विश्व हिन्दू परिषद और कुछ अन्य संगठनों के रास्ते भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश हुआ और लोग सांसद-विधायक और मंत्री तक बने.
भारतीय जनता पार्टी में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की तिकड़ी के अलावा कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार, स्वामी चिन्मयानंद, रामविलास वेदांती जैसे तमाम लोग इस सूची में शामिल हैं.
इनमें से ज़्यादातर नेता साल 2014 के बाद से ही राजनीतिक वनवास की ओर भेजे जाने लगे और अब लगभग पूरी तरह से भेजे जा चुके हैं.
राम मंदिर आंदोलन को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह इसकी वजह बताते हैं, "भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व अब जिन हाथों में है, उनका राम मंदिर आंदोलन से कोई वास्ता नहीं रहा. लेकिन ये सबको पता है कि मंदिर आंदोलन से जुड़े नेताओं का एक अलग आभामंडल हुआ करता था और एक ख़ास वर्ग में उनकी ज़बरदस्त अपील थी. मंदिर आंदोलन से जुड़े नेताओं ने मौजूदा नेतृत्व को स्वीकार भी नहीं किया. दूसरी ओर, मौजूदा नेतृत्व चाहता भी नहीं कि इनका आभा मंडल बरक़रार रहे. दरअसल, मौजूदा नेतृत्व बीजेपी की पहचान बन चुके मंदिर मुद्दे को भी बीजेपी से अलग रखने की ही कोशिश में लगा हुआ है."
अरविंद कुमार सिंह कहते हैं कि साल 2014 के बाद मंदिर आंदोलन से जुड़े नेता धीरे-धीरे राजनीतिक हाशिए पर लाए गए और अब पूरी तरह से उन्हें बीजेपी की राजनीति से दूर कर दिया गया है और पार्टी में उन्हीं नेताओं का बोलबाला है जो मंदिर आंदोलन के समय थे ज़रूर, लेकिन उस आंदोलन का वो कभी हिस्सा नहीं रहे.
उनके मुताबिक़, "नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति में थे ज़रूर लेकिन मंदिर आंदोलन के दौरान या उसके बाद भी ऐसा कोई बड़ा प्रभार या ज़िम्मेदारी उनके पास नहीं थी. उत्तर प्रदेश मंदिर आंदोलन और उसके चलते देश भर में बीजेपी के जनाधार की धुरी था. लेकिन यूपी से बड़े नेताओं को चुन-चुनकर मुख्य धारा की राजनीति से दूर कर दिया गया. वाजपेयी जी के समय ऐसा नहीं था. उस समय मंदिर आंदोलन से जुड़े नेताओं को न सिर्फ़ पार्टी में सम्मान मिला बल्कि तमाम साधु-संतों को भी राजनीति में आने का मौक़ा मिला."
विनय कटियार, कल्याण सिंह, उमा भारती, कलराज मिश्र, रामविलास वेदांती, स्वामी चिन्मयानंद जैसे बीजेपी के तमाम नेता राम मंदिर आंदोलन का भी जाना-पहचाना चेहरा हुआ करते थे. अटल बिहारी वाजपेयी का निधन हो चुका है, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और कलराज मिश्र को उम्रदराज़ होने के चलते टिकट नहीं दिया, उमा भारती ने चुनाव लड़ने से ख़ुद ही मना कर दिया जबकि कुछ लोग टिकट की आस लगाए होने के बावजूद टिकट पा नहीं सके.
राम विलास वेदांती तो पिछले हफ़्ते सरकार और बीजेपी के मौजूदा नेतृत्व पर ख़ासे नाराज़ हुए और उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगा दिया कि बीजेपी कभी राम मंदिर बनवाना चाहती ही नहीं थी.
उन्होंने कहा, "विश्व हिन्दू परिषद और आरएसएस के लोगों के बलिदान के चलते बीजेपी सत्ता में आई. लेकिन बीजेपी ने रामजन्मभूमि को स्वीकार नहीं किया, यह आश्चर्य की बात है. पांच साल हो गए, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार भी अयोध्या नहीं आए. मुझे आश्चर्य है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी भगवान राम और अयोध्या में राम मंदिर को कैसे भूल गई है."
हालांकि बीजेपी के नेता राम मंदिर के मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में होने की बात कहकर टाल देते हैं लेकिन मंदिर आंदोलन से जुड़े नेताओं के राजनीतिक वनवास पर जवाब देने में उन्हें भी दिक़्क़त होती है.
बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं, "टिकट किसे देना है, किसे नहीं देना है ये चुनाव समिति तय करती है. इस बारे में कोई एक व्यक्ति तो फ़ैसला करता नहीं है. पार्टी जिसे अधिकृत करती है, वही लोग कमेटी में होते हैं और उन्हीं की स्वीकृति से टिकट मिलता है."
Tuesday, April 2, 2019
सुप्रीम कोर्ट ने एनपीए से जुड़ा आरबीआई का सर्कुलर रद्द किया, कर्ज में फंसी कंपनियों को राहत
नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई के उस सर्कुलर को रद्द कर दिया है जिसमें कर्ज समाधान के लिए 180 दिन का वक्त देने फैसला किया गया था। आरबीआई ने पिछले साल 12 फरवरी को सर्कुलर जारी किया था। उसमें कर्जदाताओं से कहा गया कि 2,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के ऐसे लोन जिनका डिफॉल्ट करने के 180 दिन में समाधान नहीं हो पाए उन्हें इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) में लाया जाए।
सर्कुलर गैर-संविधानिक: सु्प्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई के सर्कुलर को गैर-संविधानिक और अल्ट्रा विरस बताया है। इसका मतलब यह है कि आरबीआई ने अपने कानूनी अधिकारों से आगे जाकर काम किया।
एस्सार पावर, जीएमआर एनर्जी, केएसके एनर्जी, रत्तन इंडिया पावर और एसोसिएशन ऑफ पावर प्रोड्यूसर्स ने आरबीआई के सर्कुलर को कोर्ट में चनौती दी थी।
क्या था आरबीआई का सर्कुलर?
इसके मुताबिक एक दिन का भी डिफॉल्ट करने पर कंपनी के कर्ज को एनपीए में डालने की बात थी। इसके तहत बैंक को 180 दिन की डेडलाइन खत्म होने के 15 दिन के भीतर आईबीसी कोड के तहत कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने की अर्जी देनी होती है। इस सर्कुलर से आरबीआई का लोन रिजोल्यूशन मैकेनिज्म भी वापस ले लिया गया था। बैंक पहले कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग और स्ट्रैटजिक डेट रिस्ट्रक्चरिंग के जरिए केस सुलझाते थे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बैंक अब आईबीसी के बाहर भी केस निपटा सकेंगे।
किसे मिलेगी राहत?
आरबीआई के सर्कुलर से इंफ्रास्ट्रक्चर, पावर, आयरन, स्टील और टेक्सटाइल सेक्टर को राहत मिलेगी। सबसे ज्यादा एनपीए इन्हीं सेक्टर में हैं। 11 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई के सर्कुलर पर स्थास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। कोर्ट ने सभी पेंडिंग केस अपने पास ट्रांसफर करवा लिए थे। 7 फरवरी 2019 को नए गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा था कि सर्कुलर में बदलाव की कोई योजना नहीं है।
उर्जित पटेल-सरकार के बीच विवाद की वजह था एनपीए से जुड़ा सर्कुलर
आरबीआई का एनपीएस जुड़ा सर्कुलर पिछले गवर्नर उर्जित पटेल और सरकार के बीच विवाद का मुद्दा भी था। उर्जित पटेल ने पिछले साल दिसंबर में इस्तीफा दे दिया था।
सर्कुलर गैर-संविधानिक: सु्प्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई के सर्कुलर को गैर-संविधानिक और अल्ट्रा विरस बताया है। इसका मतलब यह है कि आरबीआई ने अपने कानूनी अधिकारों से आगे जाकर काम किया।
एस्सार पावर, जीएमआर एनर्जी, केएसके एनर्जी, रत्तन इंडिया पावर और एसोसिएशन ऑफ पावर प्रोड्यूसर्स ने आरबीआई के सर्कुलर को कोर्ट में चनौती दी थी।
क्या था आरबीआई का सर्कुलर?
इसके मुताबिक एक दिन का भी डिफॉल्ट करने पर कंपनी के कर्ज को एनपीए में डालने की बात थी। इसके तहत बैंक को 180 दिन की डेडलाइन खत्म होने के 15 दिन के भीतर आईबीसी कोड के तहत कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने की अर्जी देनी होती है। इस सर्कुलर से आरबीआई का लोन रिजोल्यूशन मैकेनिज्म भी वापस ले लिया गया था। बैंक पहले कॉरपोरेट डेट रिस्ट्रक्चरिंग और स्ट्रैटजिक डेट रिस्ट्रक्चरिंग के जरिए केस सुलझाते थे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बैंक अब आईबीसी के बाहर भी केस निपटा सकेंगे।
किसे मिलेगी राहत?
आरबीआई के सर्कुलर से इंफ्रास्ट्रक्चर, पावर, आयरन, स्टील और टेक्सटाइल सेक्टर को राहत मिलेगी। सबसे ज्यादा एनपीए इन्हीं सेक्टर में हैं। 11 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई के सर्कुलर पर स्थास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। कोर्ट ने सभी पेंडिंग केस अपने पास ट्रांसफर करवा लिए थे। 7 फरवरी 2019 को नए गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा था कि सर्कुलर में बदलाव की कोई योजना नहीं है।
उर्जित पटेल-सरकार के बीच विवाद की वजह था एनपीए से जुड़ा सर्कुलर
आरबीआई का एनपीएस जुड़ा सर्कुलर पिछले गवर्नर उर्जित पटेल और सरकार के बीच विवाद का मुद्दा भी था। उर्जित पटेल ने पिछले साल दिसंबर में इस्तीफा दे दिया था।
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